संसद या हिंदू राष्ट्र का मंदिर?

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दलित महिला को राष्ट्रपति बनाया। उसके नाम पर वोट लिया। और उनको अछूत की तरह आज साईड कर दिया। संसद भवन का उद्घाटन ऐसे हो रहा है जैसे अक्षरधाम मंदिर का उदघाटन होता है। संसद नहीं हिंदू राष्ट्र का मंदिर लग रहा है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां लोकतंत्र है। आज संसद में ऐसा कुछ नहीं दिख रहा।

लेकिन मोदी, संघ, हिंदू संगठन, भाजपा आईटी सेल, भक्त, कट्टर हिंदू संघटन ऐसे जयकार कर रहे हैं जैसे हिंदू राष्ट्र की सभा हो।

हर साल कई लाख रूपये मैं टैक्स देता हूं। लेकिन यह दृश्य मुझे खुशी नहीं देता। क्योंकि मेरा पैसा देश के लिए है। किसी धर्म, संप्रदाय और उसकी गूंज के लिए नहीं है।

भारत का इतिहास वैदिक काल में बेहतर था। ज्यादा स्वतंत्रता और फ्लूडिसिटी थी। धीरे धीरे कट्टर होता गया। हिंदू राजाओं ने अपने निजी स्वार्थ के लिए हर तरह के कुकर्म और छल किए। फिर विदेशी आक्रमणकारी को न्योता दिया। और हम गुलाम हो गए। हमें अपनों ने ही लूटा। गैरों में कहां दम था.

इस्लाम और मुगल यहां आए। उन्होंने लूटा भी और बनाया भी। और यहीं के हो गए। उन्होंने ऐतिहासिक धारोहर बनाई। आज भी भारत उनके कारण जाना जाता है। ताजमहल, लाल किला और ऐसे हजारों प्रसिद्ध जगह इसके गवाह हैं। फिर आए अंग्रेज। उन्होंने भारत कि आत्मा पर चोट की। आत्मा को बदल दिया।

200 साल से ज्यादा गुलाम रखा। भारत माता का चिर और चरित्र हरण किया। यहां से लूट कर लंदन में संग्रहालय बना लिया। बंगाल के अकाल में करोड़ों लोग मर गए। उन्हें जानवर से भी बदतर कहा गया। हमें संपेरा और जाहिल गंवार कहा गया। अंग्रेजी बोलना सम्पन्नता और संभ्रांत होने की निशानी हो गई।

उनको यहां से भगाने के लिए गांधी, नेहरू, पटेल और ऐसे लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने त्याग किया, बलिदान दिया, जेल गए, शहीद हो गए, यातनाएं झेली । भारत छोड़ो आंदोलन किया। वहीं एक हिंदू महासभा थी, आरएसएस था। उनका योगदान नगण्य है। उन्होंने देश के सेनानियों के खिलाफ़ मुखबिरी की।

वीर सावरकर जिन्होंने खुद ही अपने को वीर लिखा था, और माफी पत्र लिखा था, उनका योगदान कितना प्रेरणादायक है, वह प्रश्न का विषय है। संघ और हिंदू महासभा अंग्रेजों के साथ और संघर्ष के खिलाफ दिखी। हम उनकी आरती किस बात पर गा सकते हैं? कैसे प्रेरणा ले सकते हैं? क्या योगदान हैं उनका?

नाथूराम का देश के स्वतंत्र होने में क्या योगदान है? उसने तो बस देश के बापू की हत्या की। उसका गुरु वीर सावरकर था। ये दोनो कैसे पूज्य हो सकते हैं? कोई केवल हत्या करके कैसे महान हो सकता है? उनके ही अनुयायी लगभग 100 सालों के प्रोपोगेंडा, संघ के शिविर के माध्यम से दिग्भ्रमित करके कई तरह के धर्म आधारित षणयंत्र करके , झूठ बोलकर, धीरे धीरे सत्ता पर काबिज़ हो गए।

आज संसद भवन के उद्घाटन में उस षणयंत्र को फ़लीभूत होते हुवे देख रहा हूँ।

यदि द्रौपदी मुर्मू की जगह मैं होता तो कब का इश्तिफ़ा दे चुका होता। कोई भी कुर्सी आत्मसम्मान से बड़ी नहीं हो सकती।

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